Delhi Red Fort Blast Story; Mohsin | Victim Mother | संडे जज्बात-ब्लास्ट में बेटा मरा, बहू ने लाश नहीं दी: नए कपड़े में उसके चीथड़े पड़े थे, हम इतने अभागे कि मिट्टी भी नहीं दे पाए


10 नवंबर 2025 को दिल्ली बम ब्लास्ट में जो मोहसिन मारा गया था, मैं उसकी मां हूं, संजीदा। हम सब मेरठ में रहते हैं। मेरे तीन बेटे हैं। मोहसिन दूसरे नंबर का था। अपने दो बच्चों और बीवी के साथ दिल्ली में रहता था। हमारा हंसता खेलता परिवार एक धमाके से उजड़ ग

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मेरा बेटा दिल्ली के चांदनी चौक में बैट्री रिक्शा चलाता था। दिन के 500-600 रुपए कमा लेता था। उसकी पत्नी जबरदस्ती उसे दिल्ली लेकर गई थी।

जिस दिन यह हादसा हुआ उस दिन सुबह से ही मेरा मन अच्छा नहीं था। घबराहट हो रही थी, बहुत उदास थी। उस दिन मैंने खाना भी नहीं खाया था। मेरी एक बेटी यहीं पास में रहती है। उसको फोन करके घर बुलाया तो वो कहने लगी कि तुम मेरे पास आ जाओ। मैंने सोचा था शाम तक चली जाऊंगी, लेकिन क्या पता था इस शाम तक घर में मातम छा जाएगा।

दिल्ली बम ब्लास्ट में मारे गए मेरठ के मोहसिन।

दिल्ली बम ब्लास्ट में मारे गए मेरठ के मोहसिन।

शाम के वक्त छोटे बेटे नदीम के पास मोहसिन की पत्नी का फोन आया। वो रोते हुए कहने लगी कि दिल्ली मे बम धमाका हुआ है और मोहसिन का फोन नही लग रहा है। नदीम रोता हुआ मेरे पास आया और कहने लगा कि दिल्ली में बम ब्लास्ट हुआ है और मोहसिन भाई का पता नहीं लग रहा है। नदीम उसी वक्त रोते हुए दिल्ली के लिए निकल गया। मैं भी उसके पीछे भागी लेकिन वो कहने लगा कि तुम लोग बाद में आना।

मैं बस ऊपर वाले से दुआएं मांग रही थी, एक मिनट के लिए चैन नहीं आ रहा था। आधी रात में मेरे शौहर का फोन बजा। घंटी सुनते ही मेरा दिल बैठ गया। नदीम ने फोन उठाते ही कहा, अब्बू मोहसिन नहीं रहा, हम उसको लेकर मेरठ आ रहे हैं।

ये सुनते ही मैंने कहा कि इतना इंतजार नहीं कर पाऊंगी, मुझे ही दिल्ली ले चलो। हम लोग दिल्ली के लिए निकल गए। जब मोहसिन के घर पहुंचे तो वहां सभी रिश्तेदारों की भीड़ इकट्ठा थी। नए कपड़ों में लिपटी हुई मेरे बच्चे की लाश सामने रखी थी। उसके इंतकाल से पहले घर में एक शादी थी। उसके लिए ही मेरे बेटे ने कपड़े खरीदे थे, जो उसने मरते वक्त पहन रखे थे।

किसी ने बताया कि उसका एक हाथ 5 फीट दूर पड़ा था, उसे पोस्टमार्टम में जोड़ा गया है। मुंह तो ठीक था लेकिन हाथ और टांगों पर अनगिनत जख्म थे।

मय्यत का वक्त हो रहा था। मोहसिन की पत्नी और ससुर जिद करने लगे कि मय्यत दिल्ली में ही होगी। हम इसके लिए तैयार नहीं थे, क्योंकि मेरठ के कब्रिस्तान में ही हमारे पुरखों की कब्रे हैं। इसलिए हम चाहते थे कि मोहसिन की कब्र भी वहीं हो। उसकी पत्नी मानने को तैयार नहीं थी। वह हमें उसकी यादों का वास्ता देते हुए कहने लगी कि उसकी यादें हैं यहां। वो तीन साल पहले ही दिल्ली गया थो तो वहां उसकी कैसी यादें। पला-बढ़ा तो मेरठ में था।

मोहसिन की मां रोते हुए कहती हैं कि मेरा बेटा दिल्ली नहीं जाता तो जिंदा होता।

मोहसिन की मां रोते हुए कहती हैं कि मेरा बेटा दिल्ली नहीं जाता तो जिंदा होता।

हमारे जिद करने पर उन लोगों ने मोहसिन की लाश हमे दे दी, लेकिन उसकी पत्नी हमारे साथ नहीं आई। नदीम ने कहा कि कागजी कार्रवाई के बाद मोहसिन की पत्नी और बच्चों को साथ लेकर आएगा। हम मेरछ में इंतजार करते रहे वो पता नहीं कैसे पुलिस स्टेशन पहुंच गया। पुलिस वाले कहने लगे कि सब तेरा किया धरा है, तूने अपने मां बाप को मोहसिन की लाश दे दी और तू खुद यहां रह गया। पुलिस वालों ने नदीम को मारा भी और बुलडोजर से घर तोड़ने की भी धमकी दी।

जब नदीम बहुत देर तक मेरठ नहीं पहुंचा, तब हमने मोहसिन की पत्नी को फोन किया। तो वे कहने लगी कि नदीम थाने में बंद है, मुझे मोहसिन की लाश दे दो तो नदीम को छुड़वा दूंगी। हमारा दुख तो इतना बड़ा था कि यह सब समझ ही नहीं आ रहा था।

मैंने उसके हाथ जोड़े, मेरे जेठ ने अपनी पगड़ी तक उसके पैरों में रख दी कि हमें मय्यत यहीं करने दो, नदीम को छुड़वा दो। तुम्हारा भी यहां रहना बनता है लेकिन वह नहीं मानी। हमें लगा कि एक बेटा तो चला गया है, अब दूसरा बेटा भी सारी जिंदगी जेल में सड़ेगा इसलिए बहस का कोई फायदा नहीं है।

मोहसिन की लाश लेकर मेरठ पहुंचा उनका परिवार।

मोहसिन की लाश लेकर मेरठ पहुंचा उनका परिवार।

जब हमने मोहसिन की पत्नी को उसकी मय्यत सौंपी तो वहां नदीम को छोड़ दिया गया, लेकिन हम में से कोई भी दिल्ली मोहसिन की मिट्‌टी में शामिल नहीं हुए। वह मेरे बच्चे को लेकर चली गई।

मेरा मोहसिन बचपन से ही शरारती था। खाने में तो कुछ भी पकाकर दे दो कभी मना नहीं करता था लेकिन हां कभी पैदल नहीं चलता था। उसे गोद में ही उठाना होता था। कभी कोई फरमाइश नहीं करता था। उसने मुझसे कभी कुछ नहीं मांगा, लेकिन हां कभी कहीं जाना होता तो कहता मैं नहीं जाऊंगा जब तक मुझे नई पैंट-शर्ट लेकर नहीं देते। इस हद तक शौकीन था कि उसका इंतकाल भी नए कपड़ों में हुआ। हैसियत अनुसार सभी बच्चों को एक जैसे कपड़े लाकर देती थी।

यहां तक कि साधारण भी अगर किसी रिश्तेदारी में जाना होता था तो नए कपड़े पहने बिना नहीं जाता था। मजदूर लोग हैं हम लोग। मेरे पति लूम पर काम करते हैं। बच्चों को बहुत पढ़ा तो नहीं सके हम। बस जो बन पाता था उनके लिए करते थे।

मेरे मोहसिन ने छोटी उम्र में ही काम करना शुरू कर दिया था। घर में ही पावर लूम था। बच्चे ने बचपन से अपने अब्बू को ये काम करते हुए देखा था। इसलिए बच्चे भी यही काम करने लगे।

मोहसिन की शादी को लगभग 14 साल हो चुके थे। तीन साल पहले हमें बेटियों की शादी के लिए घर बेचना पड़ा। जैसे ही हम किराए के घर में शिफ्ट हुए उसकी पत्नी कहने लगी कि मैं तो दिल्ली जाउंगी। दरअसल, वो दिल्ली की रहने वाली थी। इसलिए तीन साल पहले मोहसिन को साथ लेकर दिल्ली चली गई। अगर वो मेरे बेटे को दिल्ली न ले गई होती तो आज मेरा बेटा जिंदा होता।

जब वो पहली बार दिल्ली गया था, तो मुझसे कुछ पैसे भी लेकर गया था। कहने लगा कि कपड़े का काम करुंगा। उसने चांदनी चौक मे चादरों का काम किया लेकिन चला नहीं। तब वो कहने लगा कि दो छोटे बच्चे हैं मेरे, कम से कम उनके कपड़े लत्ते और खाने का इंतजाम तो करना ही होगा। इसलिए पिछले साल यहां आकर फिर से लूम पर काम करने लगा।

मोहसिन की पत्नी नहीं चाहती थी कि वो लूम पर काम करे। इसलिए एक महीने बाद ही मेरा बच्चा फिर से दिल्ली चला गया। वहां उसने बैट्री रिक्शा लिया। दिल्ली जाकर तो धक्के ही खाए हैं उसने। यहां से जाने के बाद वह मुझे फोन नहीं कर पाता था। काम में इतना मगन हो जाता था। मैं ही फोन करती थी उसे। मैं कहती थी कि कम से कम अपनी राजी खुशी दे दिया कर बस। कहता था कि बस काम में ध्यान नहीं रहता था।

मेरा बेटा सबसे अलग था। उसे गाने का भी शौक था। जब मैं कभी उस से नाराज हो जाती थी तो मुझे गाना गाकर मना लेता था।

हर महीने मुझसे मिलने आता था लेकिन इस बार दो महीने पहले अपने बेटे के साथ आया था। मैंने उसके लिए बिरयानी बनाई थी। उसने बहुत शौक से बिरियानी खाई थी। वो रिक्शा चलाता था इसलिए मैं उसे फोन नहीं लगाती थी। जिस दिन उसका इंतकाल हुआ, उस दिन मैं उसे फोन लगाने वाली थी। मुझे क्या पता था कि अब उससे कभी बात ही नहीं हो पाएगी।

बस मैं तो सब्र करके बैठी हूं। उसके लिए दुआ करती हूं। रो पीट कर वक्त निकाल लेती हूं। हर वक्त दुआ में रहती हूं। उसने मुझे मेरे बच्चे को मिट्‌टी तक नहीं देने दी, मेरा आखिरी हक भी छीन लिया। बच्चों को भी ले गई। मेरा बेटा तो चला गया लेकिन मेरे बच्चे के बच्चों से भी अब बात नहीं करने देती। किस हक से उनसे बात करूं। क्या करूं। जिंदगी भर यह मलाल रहेगा। मैंने आखिरी वक्त बेटे को देखा तक नहीं।

इस बम धमाके की वजह से जो नाइंसाफी मेरे साथ हुई है, दूसरे बहनों और मांओं के के साथ हुई है उनके गुनहगारों को कड़ी से कड़ी सजा मिलनी चाहिए। मुझे तो इंसाफ मिला लेकिन, दुआ है कि बाकियों को मिल जाए।

(संजीदा ने अपने ये जज्बात भास्कर रिपोर्टर मनीषा भल्ला से साझा किए हैं।)

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